वकालत छाेड़ 1942 में आजादी की लड़ाई में कूदे स्वतंत्रता सेनानी राजकुमार बाबू पिता को मुखाग्नि तक नहीं दे पाए थे
चमकी वकालत छोड़ कर आजादी की लड़ाई में कूद पड़े थे राज कुमार बाबू। अपने पिता को मुखाग्नि तक नहीं दे सके थे। वे अपने माता-पिता के इकलौते संतान थे। पैतृक गांव के लोगों ने ही दाह संस्कार किया। बात वर्ष 1942 की है। 11 अगस्त को महात्मा गांधी समेत कांग्रेस कमेटी के शीर्ष नेताओं को अंग्रेजी हुकूमत ने गिरफ्तार कर लिया था। इसकी सूचना जमीनी स्तर पर न पहुंचे। इसलिए टेलीफोन लाइन भी काट दिए गए थे।
किसी तरह यह सूचना भभुआ तक पहुंची। भभुआ अगस्त क्रांति का गवाह बना। अंग्रजी हुकूमत के गोलीबारी में अंतु राम को शहादत भी देनी पड़ी। तिवाई गांव से भभुआ आए राजकुमार बाबू वकालत छोड़ कर महात्मा गांधी और राजेंद्र प्रसाद के आह्वान पर आजादी के आंदोलन में मुखर होकर नेतृत्व करते रहे। शीर्ष नेताओं की गिरफ्तारी के विरोध में 10 व 11 अगस्त 1942 को भभुआ के सभी स्कूल और दुकानें बंद रहे।
इसके बाद स्वाधीनता के लिए भभुआ की सड़कों पर हर रोज जुलूस वह अंग्रेजों भारत छोड़ो के नारे बुलंद होते रहे। क्रांतिकारियों ने डाकघर सहित कई जगहों पर तिरंगा लहरा दिए थे। क्रांति के बीज गांव गांव में फैल चुका था। इस बीच अंग्रेजी हुकूमत ने डाकघर, हाइ स्कूल पर लगाए तिरंगे को हटाया दिया। इससे जनता में आक्रोश फुट पड़ा। 14 अगस्त को बैठक कर एकजुटता के साथ क्रांतिकारियों का हुजूम अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफत में डाकघर में तोड़फोड़ की।
थानेदार के रिपोर्ट पर धोखे से गिरफ्तार करवा लिया
14 अगस्त को ही तत्कालीन सब डिविजनल ऑफिसर कम स्पेशल मजिस्ट्रेट रामेश्वर प्रसाद ने राजकुमार बाबू को थानेदार के रिपोर्ट पर धोखे से गिरफ्तार करवा लिया। इसकी सूचना आग की तरह गांवों में फैली। इस बीच अंग्रेजी हुकूमत के सिपाहियों ने गोलीबारी कर दी। जिसमें अंतू राम शहीद को शहादत देनी पड़ी। दूसरे दिन जनता के दबाव पर सब डिविजनल अफसर ने 1000 के बांड पर राजकुमार बाबू को रिहा कर दिया।
अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ एक निर्णय से हिंदू मुस्लिम एकता की मिसाल कायम कर गए राजकुमार बाबू
जब अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ घर-घर बगावत तेज हो गई तो फूट डालकर हिन्दू-मुस्लिम को अलग करना हुकूमत की नियति बन गई थी। अंग्रेजी हुकूमत ने भभुआ में भी यही किया। तब मुस्लिम पक्ष की ओर से ताजिए निकाले जा रहे थे। स्वतंत्रता सेनानी राजकुमार लाल पुत्र अशोक कुमार सिन्हा बताते हैं की उनके इस निर्णय की सराहना पूरे इलाके में हो रही थी। यह वर्षों बाद तक चर्चा में रही। अंग्रेजी हुकूमत के वफादार मुस्लिमों को भड़का कर एकता को तोड़ना चाहते थे। ताजिए के समय खाकी गुसाईं मंदिर के पास एक पीपल का वृक्ष था। इसी पर बात अटक गई थी। हिंदू पक्ष पीपल के वृक्ष की कटाई के खिलाफ था। मुस्लिम पक्ष पीपल की टहनियों को काटकर ताजिया निकालने की जिद पर था। दोनों समुदायों में तनाव बढ़ रहे थे। इसी बीच राजकुमार बाबू की एक सूझबूझ की निर्णय से दोनों समुदायों के एकता का मिसाल बन गया। वृक्ष की टहनियों को खींचकर बांधी गई इससे ताजिया निकल गया हिंदू और मुस्लिम पक्ष दोनों की बात रह गई। फिर यह एकता का मिसाल सालों तक दिया जाता रहा।
साढ़े 15 साल की सश्रम कैद की सजा सुना दी गई थी
अपने पिता से सुने उनकी व्यथा को याद करते हुए अशोक कुमार सिन्हा कहते हैं कि पिता राजकुमार लाल आजीवन कुढ़ते रहे। उन्हें एक कसक थी कि वह अपने पिता को इकलौते पुत्र होने का धर्म भी नहीं निभा सके। उन्हें मुखाग्नि तक नहीं दे सके। अगस्त क्रांति में अंग्रेजी हुकूमत के द्वारा चलाई गई मुकदमे में राजकुमार बाबू को साढ़े 15 साल की सश्रम कैद की सजा सुना दी गई थी। इसी खबर पर उनके पिता अखोरी श्याम बिहारी लाल की ह्रदय गति रुक गई थी। तब वे अंतिम संस्कार भी नहीं कर सके थे। गांव के लोगों ने ही रीति रिवाज से संस्कार किया।
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