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घर पर चोरी हुई, पिता को ईंट भट्‌टे पर काम करना पड़ा, एनआईटी से बना इंजीनियर

उत्तर-प्रदेश के लखीमपुर जिले के एक छोटे से गांव में रहते हैं विजय प्रकाश। उनके पिता की गांव में ही एक छोटी सी दुकान थी। आपसी बंटवारे में दुकान भी बंद हो गई। खेती के लिए कोई जमीन भी नहीं थी। विजय प्रकाश के सामने अपने चार बच्चों के लिए दाल-रोटी की व्यवस्था एक बड़ी चुनौती से कम नहीं थी। निर्धनता की वजह से पढ़ाई भी नहीं हुई थी। अब छोटी सी जमीन जो उनके हिस्से मिली थी, उसे बेचकर उन्होंने घर में ही आटा-चक्की लगा ली।

आटा-चक्की के साथ-साथ अब विजय प्रकाश की दाल-रोटी भी चलने लगी। लेकिन, जीवन इतना आसन कहां होता है। एक दिन जब सुबह विजय प्रकाश के परिवार की नींद खुली तब देखा कि आटा-चक्की चोरी हो चुकी है। इसके बाद कर्ज लेकर उन्होंने एक छोटी सी दुकान खोली ताकि परिवार की दाल-रोटी चल सके। कुछ दिनों बाद फिर आफत आई। दुकान में किसी ने आग लगा दी और सब-कुछ राख हो गया। अब मेहनत-मजदूरी के अलावा कोई विकल्प नहीं था।

कुछ दिनों के प्रयास के बाद विजय प्रकाश को गांव के पास ही ईंट-भठ्ठे पर काम मिल गया। सुबह-सुबह उठकर ईंट भठ्ठे पर चले जाते और देर रात तक ट्रैक्टर पर ईंट लोड करने का काम करते थे। बड़ा बेटा विकास निगम पढ़ाई में खूब मन लगता था। विजय प्रकाश की इच्छा बेटे को इंग्लिश-मीडियम स्कूल में भेजने की थी। लेकिन, न तो गांव के आप-पास कोई इंग्लिश-मीडियम स्कूल था और न ही शहर भेजकर पढ़ाने के लिए पैसे थे। लेकिन, सरकारी स्कूल में भी बहुत खुश था विकास। उसके पिता बताते हैं कि जब सुबह-सुबह तैयार होकर विकास पढ़ने स्कूल जाया करता था तब यह देखकर वह बहुत खुश हो जाते थे। परंतु अब तो दाल-रोटी की व्यवस्था के बाद कॉपी-कलम और किताबों के लिए भी पैसे नहीं बच रहे थे।

विजय प्रकाश डरने लगे कि कहीं विकास की पढ़ाई न छूट जाए। एक दिन उन्हें उदास देखकर एक ट्रैक्टर ड्राईवर ने उनकी उदासी का कारण पूछा। उसने कहा कि मैं सहायता कर सकता हूं। और फिर आमदनी बढ़ाने के लिए ड्राईवर ने विजय प्रकाश को ट्रैक्टर चलाना सिखा दिया। अब कुछ आमदनी बढ़ जाने की वजह से किताब-कॉपी की व्यवस्था होने लगी। विजय प्रकाश को सिर्फ पर्व-त्यौहार के ही दिन छुट्टी मिलती थी और उस दिन अपने बेटे विकास से खूब बातें करते थे। अब विकास दसवीं पास कर चुका था।

अच्छे नंबर भी आए थे। स्कूल के सभी शिक्षकों ने विकास को कोटा जाकर इंजीनियरिंग प्रवेश-परीक्षा की तैयारी करने की सलाह दी। लेकिन, आर्थिक लाचारी ऐसी थी कि विकास गांव से भी बाहर नहीं जा सकता था। कुछ ही दिनों में किसी ने उसे सुपर 30 के बारे में बताया। मुझे आज भी याद है कि उस वर्ष हमलोग बच्चों के चुनाव के लिए लखनऊ गए हुए थे। विकास सुपर 30 का हिस्सा बन चुका था। पहली बार अपने पिता के साथ पटना आया और फिर परीक्षा तक लगातार मेरे साथ ही रहा। रिजल्ट के बाद वह बहुत खुश था और अपने पिता के साथ मुझसे मिलने भी आया था। उसके पिता बहुत खुश थे। उसका एनआईटी में सलेक्शन हुआ था। अब तो वह दिल्ली में बहुत अच्छी नौकरी भी कर रहा है। अभी हाल में ही जब उनसे बात हुई तब उन्होंने बताया कि उनका दूसरा बेटा भी इंजीनियरिंग के अंतिम वर्ष में है।



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आनंद कुमार (फाइल फोटो)


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