जदयू के पाले में मांझी के आते ही चिराग की बार्गेनिंग पावर कुछ कमजोर पड़ गई
(प्रो. संजय कुमार, सीएसडीएस) लोजपा अध्यक्ष चिराग पासवान के तेवर की काट जदयू ने हम के जीतन राम मांझी के रूप में तलाशा क्योंकि चिराग गठबंधन में ज्यादा सीटे मांग रहे थे और नीतीश की कतिपय नीतियों के खिलाफत भी कर रहे थे। नतीजा हुआ कि जदयू के फोल्ड में मांझी के आते ही चिराग की बार्गेनिंग पावर कमजोर पड़ गई।
पिछले विधानसभा चुनाव में भी लोजपा का प्रदर्शन ठीक नहीं था। तब लोजपा, भाजपा के दूसरे बड़े घटक के तौर पर 42 सीटों पर लड़ी थी। लोजपा के लिए तब ज्यादा सीटों की गुंजाइश इसलिए बन गई थी जदयू, यूपीए में शामिल हो गई थी। जदयू के राजग में लौटते ही लोजपा का कोटा कम होना ही था।
बीते चुनाव में उसके 2 विधायक ही जीते थे जबकि जदयू को 71 और भाजपा को 53 सीटें मिली थीं। सीट शेयरिंग के किसी भी फार्मूले पर लोजपा की सीटों की चाहत पूरी नहीं होती। मांझी के आते ही मोल-तोल के लिए अब लोजपा के पास अवसर भी नहीं बचा।
विधानसभा में न के बराबर सदस्य संख्या के बावजूद लोजपा की ताकत को माइनस नहीं किया जा सकता। पार्टी की पासवान वोटरों पर मजबूत पकड़ है और संख्या के दृष्टिकोण से यह जाति दलितों में सर्वाधिक है। सीएसडीएस के सर्वे में यह प्रमाणित भी हुआ है। पार्टी अपना शत-प्रतिशत वोट शिफ्ट कराने की ताकत रखती है। 2005 में जब लोजपा अकेले लड़ी तो बड़ी संख्या में पासवान जाति का वोट उसे मिला।
2010 में जब उसने राजद से गठजोड़ किया जो गठबंधन को 57% पासवान वोट मिले। और जब 2015 में लोजपा एनडीए का हिस्सा बनी तो 51% वोट वहां लेती गई। लोजपा के एनडीए से नाता तोड़ने की आशंका को देखते हुए और पासवान वोटों की भरपाई के लिए ही जदयू ने मांझी को अपने साथ किया जिसे नीतीश कुमार का मास्टर स्ट्रोक माना जा सकता है।
लोजपा के नाता तोड़ने के बाद नीतीश, मांझी को साथ लाने की कोशिश करते तो मांझी की सौदेबाजी बढ़ जाती। हम के राजग में आते ही लोजपा की मोल-मोलाई घट गई। लोजपा और हम राजग के ही साथ रहे तो एनडीए को फायदा बड़ा होगा। लोजपा चली भी गई तो नुकसान की मात्र कम होगी। चिराग की महत्वाकांक्षा मुख्यमंत्री बनने की है, जिसे वह जता भी चुके हैं।
एनडीए का चुनावी चेहरा नीतीश कुमार हैं। ऐसे में एनडीए में तो जगह नहीं बनती। यूपीए में भी उनकी इस दावेदारी को समर्थन मिलने की संभावना कम है। ऐसे में अकेले चुनाव लड़ना ही एकमात्र विकल्प बचता है। चिराग अकेले चुनाव लड़ने का फैसला करते हैं तो उन्हें याद रखना चाहिए कि कैसे 2005 अक्टूबर के विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी को झटका लगा था।
तब फरवरी में 29 सीटें जीतने वाली लोजपा खिसकर 10 सीटों पर आ गई थी। तब रामविलास पासवान के कड़े रुख के कारण दोबारा चुनाव की नौबत आई थी। चिराग को सावधान रहना होगा कि ऐसी नौबत नहीं आए।

चिराग अकेले लड़ने का फैसला करते हैं तो उन्हें याद रखना चाहिए कि कैसे 2005 अक्टूबर के विस चुनाव में उनकी पार्टी को झटका लगा था। तब फरवरी में 29 सीटें जीतने वाली लोजपा खिसकर 10 सीटों पर आ गई थी।
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